जीवित पुत्रिका व्रत पूजन और उसकी विधि
आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित पुत्रिका के रूप में मनाते है इस व्रत को करने से पुत्र शोक नही नही होता है इस व्रत का स्त्री समाज में बहुत ही महत्व है इस व्रत में सुर्य नारायण की पूजा की जाती है ।

एक प्राचीन कथा अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात् पाण्डवो की अनुपस्थिति में कृतवर्मा और कृपाचार्य को साथ लेकर अश्वथामा ने पाण्डावो के शिविर मे प्रवेश किया । अश्वथामा ने द्रोपदी के पुत्रो को पाण्डव समझकर उनके सिर काट दिये । दूसरे दिन अर्जून कृष्ण भगवान को साथ लेकर अश्वथामा की खोज में निकल पडा और उसे बन्दी बना लिया । धर्मराज युधिष्ठर और श्रीकृष्ण के परामर्श पर उसके सिर की मणि लेकर तथा केश मूंडकर उसे बन्धन से मुक्त कर दिया । अश्वथामा ने अपमान का बदला लेने के लिये अमोघ अस्त्र का प्रयोग पाण्डवो के वशंधर उत्तरा के गर्भ पर कर दिया । पाण्डव का उस अस्त्र का प्रतिकार नही जाते थे । उन्होने श्रीकृष्ण से उत्तरा के गर्भ की रक्षा की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके उसकी रक्षा की । किन्तु उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न हुआ बालक मृत प्रायः था । भगवान ने उसे प्राण दान दिया । वही पुत्र पाण्डव के वंश को चलाने वाला हुआ | जिसका नाम परीक्षित हुआ । परीक्षित को इस प्रकार जीवनदान मिलने के कारण इस व्रत का नाम ”जीवित्पुत्रिका“ पडा ।
जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा – जब भगवान कृष्ण द्वारिका में रहते
थे तब
वहाँ एक ब्राह्मण भी रहता था| उसके सात पुत्र बचपन में ही
मर गए| इससे ब्राह्मण बहुत
दुखी रहने लगा| एक दिन वह
भगवान कृष्ण के
पास गया और
कहने लगा कि
मेरे सात पुत्र हुए लेकिन एक भी नहीं
बचा| कृपया कर मुझे
इसका कारण बताएँ और उपाय भी
बताएँ| कृष्ण जी कहने
लगे कि अब
की बार तुम्हारा जो पुत्र पैदा
होगा उसकी तीन
वर्ष की आयु
रहेगी लेकिन उसकी
उम्र बढ़ाने के
लिए तुम सूर्य नारायण की पूजा
करो और पुत्रजीवी व्रत का पालन
करो| ऎसा करने से
तुम्हारे पुत्र की
आयु बढ़ जाएगी.
भगवान कृष्ण के कहे अनुसार ब्राह्मण ने व्रत
को किया| पूरे परिवार के
साथ वह इस
व्रत को कर
रहा था और
हाथ जोड़ विनती करने लगा –
सूर्यदेव विनती सुनो, पाऊँ दुख अपार ।
उम्र बढ़ाओ पुत्र की कहता बारम्बार ।।
ब्राह्मण की यह
विनती सुनते ही
सूर्यदेव का रथ
वहीं रुक गया
और उसकी विनती से प्रसन्न होकर
सूर्यदेव ने अपनी
गले की एक
माला ब्राह्मण के
गले में डाल
दी और फिर
अन्तर्ध्यान हो गए| कुछ समय बाद
ही यमराज उस ब्राह्मण पुत्र के प्राण लेने
आए| यमराज को देख
ब्राह्मण और ब्राह्मणी कृष्ण जी को
झूठा समझने लगे
इससे भगवान कृष्ण को अपना अपमान लगा और तुरंत सुदर्शन चक्र लेकर
आ गए और
ब्राह्मण से बोले
कि कि इस
माला को अपने
पुत्र के गले
से निकालकर यमराज के गले में
डाल दो| ब्राह्मण ने माला
उतारी तो यमराज डर से भाग
गए|
यमराज तो डर
कर भाग गए किन्तु उनकी
छाया वहीं रह
गई| माला को छाया
पर फेंकने से
वह छाया शनि
रुप में भगवान कृष्ण से प्रार्थना करने लगी| भगवान कृष्ण को
शनि पर दया
आ जाती है
और वह उन्हें पीपल के पेड़
पर रहने के
लिए कहते हैं| उसी दिन से
शनि की छाया पीपल के
वृक्ष पर रहने
लगी| इस प्रकार भगवान कृष्ण की कृपा
से ब्राह्मण पुत्र की उम्र बढ़
गई| भगवान कृष्ण इसी
प्रकार से सभी
पर अपनी कृपा
दृष्टि बनाए रखें|
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