छठ पूजा व सूर्य पूजा





छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। दीपावली के छठे दिन से शुरू होने वाला छठ का पर्व चार दिनों तक चलता है। इन चारों दिन श्रद्धालु भगवान सूर्य की आराधना करके वर्षभर सुखी, स्वस्थ और निरोगी होने की कामना करते हैं। चार दिनों के इस पर्व के पहले दिन घर की साफ-सफाई की जाती है छठ पूजा को देश के कई हिस्सों में बिहार और उत्तर प्रदेश से आये लोगों की पहचान के रूप में देखा जाता रहा है। यही कारण है कि महाराष्ट्र में शिवसेना और उससे टूटकर अलग हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता कई बार इसका विरोध कर चुके हैं और इस पर्व को एक प्रकार के शक्ति प्रदर्शन का नाम दे चुके हैं।

सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलम्बी भी मनाते देखे गये हैं। धीरे-धीरे साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है।

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएँ यह व्रत रखती हैं। पुरुष भी पूरी निष्ठा से अपने मनोवांछित कार्य को सफल होने के लिए व्रत रखते हैं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।


कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।

पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित होता है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ भक्तिगीत गाये जाते हैं। आजकल कुछ नई रीतियाँ भी आरम्भ हो गयी हैं, जैसे— पंडाल और सूर्यदेवता की मूर्ति की स्थापना करना। उसपर भी रोषनाई पर काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्य के उपरांत आयोजनकर्ता माईक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं। पटाखे भी जलाये जाते हैं। कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्रा का भी आयोजन होता है; परंतु साथ-ही-साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बाँटी जाती है। पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं।

भइयादूज





भाई दूज का त्योहार भाई बहन के स्नेह को बतलाता है, इस त्यौहार में बहन भाई की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है, तिलक लागाती है, और पूजन करती है फिर भाई बहन को उपहार भेट करता है। यह त्योहार दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार हिन्दू धर्म के लोग बहुत ही आनंद पूर्वक मनाते है| भैया दूज को भ्रातृ द्वितीया भी कहते हैं।

इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। इस दिन बहनें भाइयों के स्वस्थ तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके तिलक लगाती हैं। इस दिन बहनें भाइयों को तेल मलकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। कहा जाता है यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए।

हिन्दू धर्म में भाई-बहन के प्रेम-प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं, एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है। दूसरा त्योहार, 'भाई दूज' का होता है। भाई दूज का त्योहार कार्तिक मास की द्वितीया को मनाया जाता है। इसमें बहनें भाई की लम्बी आयु की प्रार्थना करती हैं।

इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई तथा बहन के पावन संबंध व प्रेमभाव की स्थापना करना है।

यदि बहन अपने हाथ से भाई को जीमाए तो भाई की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। इस दिन चाहिए कि बहनें भाइयों को चावल खिलाएं। इस दिन बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि स्त्रीत्व पदार्थ का ध्यान करके अथवा उसके समीप बैठ कर भोजन कर लेना भी शुभ माना जाता है।

इस दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहन भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं। इस दिन यमराज तथा यमुना जी के पूजन का विशेष महत्व है।


भैया दूज की कथा एक बार भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।
यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया। यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।

गोवर्धन पूजा





यह त्यौहार दीवाली की अगली सुबह गोवर्धन त्यौहार मनाया जाता है| कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है| लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व की अपनी मान्यता और लोककथा है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही यह त्यौहार मनाया जाता है|

कथा है कि जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

गोवर्धन पर्वत को श्री कृष्ण ने इसलिए उठाया किएक बार देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था। इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची। प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे। श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया " मईया ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं" कृष्ण की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं। मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? मैईया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है। भगवान श्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए।

लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है। तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया। इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी। इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें।

इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया। ब्रह्मा जी ने इन्द्र से कहा कि आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं। ब्रह्मा जी के मुंख से यह सुनकर इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा। आप दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल क्षमा करें। इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया।

इस पौराणिक कथा के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्घन पर्वत की पूजा करते हैं। गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है। इस त्यौहार को लोग बड़ी धूम धाम से मनाते है| और दीवाली के अवसर पर रोशनी करके घर को भी जग मगाते है|

दीपावली व दिवाली





इस त्यौहार को कई नाम से जानते है, दीवाली या दीपावली अर्थात "रोशनी का त्योहार" शरद ऋतु के कार्तिक मास में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है। दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।कि इस दिन राम जी रावण को मार कर व वनवास के पश्चात अयोध्या १४ वर्ष बाद लौटे थे, तो इस अवसर पर अयोध्यावासियों ने राम जी के आने की खुशी में घी के दीपक जलाए थे| कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात दीपकों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से वह प्रथा आज तक चल रही है| भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास व धूम धाम से मनाते हैं।

यह त्यौहार भारत व नेपाल में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।

इस त्यौहार में कई दिनों पहले ही तैयारियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य शुरू कर देते हैं। घरो को लोग सजाने लगते है और नए वस्त्र- आभूषण भी लेते है| लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। और बाजार में भी खूब चहल- पहल रहती है| इस त्यौहार में बच्चे लोग पटाखे, आतसबाजी छोड़ते है| और घरो में कई प्रकार के पकवान बनाए जाते है| इस त्यौहार में लोग खूब आनंद लेते है| दिवाली के त्यौहार भगवान गनपति व माता लक्ष्मी की पूजा होती है|

यह मान्यता है कि एक बार गणपति के विवाह की बात चली तो माता पार्वती ने कहा कि गणपती तुम्हे जो कन्या सुबह दिख जाए उससे तुम्ह विवाह कर लेना | फिर गणपति जब सुबह उठते है, तो माता लक्ष्मी उनके सामने दिखाई पड़ती है यह बात जब सही को पता चलती है तो माता पार्वती कहती है कि लक्ष्मी तो तुम्हारी माता सामान है और विवाह तो ये संभव नहीं है परन्तु जो बात हुई तो वह सत्य भी हो तो माता ने दीवाली के दिन भगवान् गणपती और माता लक्ष्मी की पूजा- अर्चना करने को कहा- तभी से दीवाली के दिन माता लक्ष्मी व भगवान् गणेश की पूजा होती है पूजा के दौरान जो गणेश जी के बाई ओर माता लक्ष्मी की मूर्ती को रखा जाता है| और बहुत ही बिधि विधान से दीवाली के पर्व को मनाते है|

धनतेरस


धनतेरस कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। यह त्यौहार दीपावली से तीन दिन पहले मनाया जाता है| धनतेरस पर पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन लक्ष्मी-गणेश और कुबेर की पूजा की जाती है। ‘धन’ का मतलब समृद्धि और ‘तेरस’ का मतलब तेरहवां दिन होता है। धनतेरस यानी अपने धन को तेरह गुणा बनाने और उसमें वृद्धि करने का द‌िन। इसी दिन भगवान धनवन्‍तरी का जन्‍म हुआ था जो कि समुन्‍द्र मंथन के दौरान अपने साथ अमृत का कलश व आयुर्वेद लेकर प्रकट हुए थे और इसी कारण से भगवान धनवन्‍तरी को औषधी का जनक भी कहा जाता है। धनतेरस के दिन सोने-चांदी के बर्तन खरीदना भी शुभ माना जाता है। इस दिन धातु खरीदना भी बेहद शुभ माना जाता है।

धनतेरस के दिन से दीपावली मनाई जाती है और मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियां की जाती हैं। लक्ष्मी के पैरों के संकेत के तौर पर रंगोली से घर के अंदर तक छोटे छोटे पैरों के चिह्न बनाए जाते हैं। शाम को 13 दिए जला कर लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी पूजा से समृद्धि, खुशियां और सफलता मिलती है।

धनतेरस के दिन लोग सोना या चांदी या बर्तन खरीदते हैं। जमीन, कार खरीदने, निवेश करने और नए उद्योग की शुरूआत के लिए भी यह दिन शुभ माना जाता है। गांवों में इस दिन लोग पशुओं की पूजा करते हैं। वह मानते हैं कि उनकी आजीविका पशुओं से चलती है इसलिए आय के स्रोत के तौर पर उनकी पूजा करना चाहिए। दक्षिण भारत में इस दिन गायों को खूब सजाया जाता है और फिर उनकी पूजा की जाती है। गायों को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।

देव उथानी एकादशी


हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर २६ हो जाती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। कहीं-कहीं इस तिथि को 'पद्मनाभा' भी कहते हैं। सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है। इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें उठाया जाता है। उस दिन को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। इस बीच के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है।

देवशयनी एकादशी व्रतविधि एकादशी को प्रातःकाल उठें। इसके बाद घर की साफ-सफाई तथा नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएँ। स्नान कर पवित्र जल का घर में छिड़काव करें। घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र स्थल पर प्रभु श्री हरि विष्णु की सोने, चाँदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति की स्थापना करें। तत्पश्चात उसका षोड्शोपचार सहित पूजन करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीतांबर आदि से विभूषित करें। तत्पश्चात व्रत कथा सुननी चाहिए। इसके बाद आरती कर प्रसाद वितरण करें। अंत में सफेद चादर से ढँके गद्दे-तकिए वाले पलंग पर श्री विष्णु को शयन कराना चाहिए। व्यक्ति को इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करें।

पुराणों में वर्णन आता है कि भगवान विष्णु इस दिन से चार मासपर्यंत (चातुर्मास) पाताल में राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इसी प्रयोजन से इस दिन को 'देवशयनी' तथा कार्तिकशुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इस काल में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, ग्रहप्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म है, वे सभी त्याज्य होते हैं। भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है।

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया। अत: उसी दिन से आरम्भ करके भगवान चार मास तक क्षीर समुद्र में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। पुराण के अनुसार यह भी कहा गया है कि भगवान हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्न होकर पाताल लोक का अधिपति बना दिया और कहा वर मांगो। बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य रहें। बलि के बंधन में बंधा देख उनकी भार्या लक्ष्मी ने बलि को भाई बना लिया और भगवान से बलि को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। तब इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वारा वर का पालन करते हुए तीनों देवता ४-४ माह सुतल में निवास करते हैं। विष्णु देवशयनी एकादशी से देवउठानी एकादशी तक, शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते हैं।

एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की, तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया- सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। किंतु भविष्य में क्या हो जाए, यह कोई नहीं जानता। अतः वे भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है।

उनके राज्य में पूरे तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। इस दुर्भिक्ष (अकाल) से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि में कमी हो गई। जब मुसीबत पड़ी हो तो धार्मिक कार्यों में प्राणी की रुचि कहाँ रह जाती है। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी वेदना की दुहाई दी।

राजा तो इस स्थिति को लेकर पहले से ही दुःखी थे। वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन- सा पाप-कर्म किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है? फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए। वहाँ विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ऋषिवर ने आशीर्वचनोपरांत कुशल क्षेम पूछा। फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का प्रयोजन जानना चाहा।

तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा- 'महात्मन्‌! सभी प्रकार से धर्म का पालन करता हुआ भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूँ। आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है, कृपया इसका समाधान करें।' यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- 'हे राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है।

इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक वह काल को प्राप्त नहीं होगा, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा। दुर्भिक्ष की शांति उसे मारने से ही संभव है।'

किंतु राजा का हृदय एक नरपराधशूद्र तपस्वी का शमन करने को तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा- 'हे देव मैं उस निरपराध को मार दूँ, यह बात मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है। कृपा करके आप कोई और उपाय बताएँ।' महर्षि अंगिरा ने बताया- 'आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।'

राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष महत्व का वर्णन किया गया है। इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसी कारण लोग इस व्रत को पूरी श्रद्धा भाव से करते है|

करवा चौथ


यह त्यौहार विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है| इस त्यौहार में विवाहित महिलाए अपने पति की लम्बी आयु के लिए इसमें निर्जल व्रत रखती है | और इस व्रत को तभी तोडती है जब आकाश में चन्द्रमा को चलनी के माध्यम से देखती है| और पूजन करती है| यह व्रत हिन्दू धर्म में हर विवाहित महिला अपने पति के लिए रखती है|

एक प्राचीन कथा है, एक साहूकार के सात बेटे थे | उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।

इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।

वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।

एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।

इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।

सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।

अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले। इस त्यौहार में हर घर में बहुत सारे पकवान बनते है, और बाजारों में भी खूब किलकारिया, व सजावट देखने को मिलती है| और खूब खुशिया मनाई जाती है| इसमें महिलाओं के मायके पक्ष से खूब उपहार मिलते है| यह त्यौहार हर सुहागन औरत का होता है| इसलिए यह त्यौहार मनाया जाता है|

महाऋषि वाल्मिकी जयंती



महर्षि वाल्मीकि का जन्म दिवस  की शरद पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।
महर्षि वाल्मीकि वैदिक काल के महान ऋषियों में माने जाते हैं। महर्षि बाल्मीक संस्कृत भाषा के आदि कवि और आदि काव्य 'रामायण' के रचयिता के रूप में सुप्रसिद्ध हैं। इनकी माता का नाम चर्षणी था| वाल्मीकि रामायण में स्वयं कहते हैं कि वे प्रचेता के पुत्र हैं। मनुस्मृति में प्रचेता को वशिष्ठ , नारद , पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है। बताया जाता है कि प्रचेता का एक नाम वरुण भी है और वरुण ब्रह्माजी के पुत्र थे। यह भी माना जाता है कि वाल्मीकि वरुण अर्थात् प्रचेता के 10वें पुत्र थे और उन दिनों के प्रचलन के अनुसार उनके भी दो नाम 'अग्निशर्मा' एवं 'रत्नाकर' थे।
महर्षि वाल्मीकि के भाई का नाम भृगु था। उपनिषद के विवरण के अनुसार यह भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। मनुस्मृति के अनुसार प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि भी इन्हीं के भाई थे।
एक बार ध्यान में बैठे हुए वरुण-पुत्र के शरीर को दीमकों ने अपना घर बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब वाल्मीकि वहा से बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे।
किंवदन्ती है कि बाल्यावस्था में ही रत्नाकर को एक निःसंतान भीलनी ने चुरा लिया और प्रेमपूर्वक उनका पालन-पोषण किया। जिस वन प्रदेश में उस भीलनी का निवास था वहाँ का भील समुदाय वन्य प्राणियों का आखेट एवं दस्युकर्म करता था।


महर्षि वाल्मीकी का जीवन-

वाल्मीकि ॠषि के जन्म को लेकर भी उसी प्रकार का विवाद है जैसा संत कबीर के बारे में है। वाल्मीकि का अर्थ चींटियों की मिट्टी की बांबी है। जनश्रुति के अनुसार एक भीलनी या निषादनी ने एक एक चींटियों की बांबी पर एक बच्चा पड़ा पाया। वह उसे उठा ले गई और उसका नाम रख दिया वाल्मीकि।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि बनने से पूर्व वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन हेतु लोगों को लूटा करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले, तो रत्नाकर ने उन्हें लूटने का प्रयास किया।  नारद जी ने रत्नाकर से पूछा कि- तुम यह बुरा कार्य किसलिए करते होइस पर रत्नाकर ने उत्तर दिया कि अपने परिवार को पालने के लिए करता हूँ | इस पर नारद ने प्रश्न किया कि तुम जो भी अपराध करते हो और जिस परिवार के पालन के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार होंगे क्या ? यह सुन कर इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए रत्नाकर, नारद को पेड़ से बांधकर अपने घर गए। वहां जाकर घर के लोगो से पूछा तो पता चला कि घर का कोई सदस्य उसके पाप का भागीदार बनने को तैयार नहीं है। यह सुन कर रत्नाकर लौटकर आये और नारद के चरण पकड़ लिए।
तब नारद मुनि ने कहा कि- हे रत्नाकर, यदि तुम्हारे परिवार वाले इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिए यह पाप करते हो। इस तरह नारद जी ने इन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित करवाया और उन्हें राम-नाम के जप का उपदेश भी दिया था, परंतु वह 'राम' नाम का उच्चारण नहीं कर पाते थे। तब नारद जी ने विचार करके उनसे मरा-मरा जपने के लिए कहा और मरा रटते-रटते यही 'राम' हो गया और निरंतर जप करते-करते हुए वह ऋषि वाल्मीकि बन गए।
इसलिए कहा जाता है- 
               उल्टा नाम जपत जग जाना,बाल्मीक भये ब्रम्ह समाना||
यह भी कहा जाता है कि उन्होंने राम जी के दो पुत्र लव और कुश को शिक्षा दी और रामयण को उल्लेखित किया | महर्षि बाल्मीक यह भी जानते थे कि राम जी के भविष्य  में क्या होगा | उन्होंने राम जी के आंधे जीवन में ही पूरी राम कथा लिख दी थी| 
इसलिए आज के इस युग में महर्षि बाल्मीक जी की जयन्ती मनाई जाती है|

दशहरा





दशहरा एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिन्दू त्यौंहार है जो पूरे भारत के लोगों के द्वारा हर साल बेहद धूम धाम के साथ मनाया जाता है। ये एक धार्मिक और पारंपरिक उत्सव है जिसे हर सनातन धर्म वाल़े को जानना चाहिये। दशहरा को लोग विजयदशमी के नाम से भी जानते है, इसे पूरे भारत के लोग जबरजस्त उत्साह और खुशी के साथ मनाते है। ये भारत के प्रमुख धार्मिक त्योहारों में से एक है। ऐतिहासिक मान्यताओं और प्रसिद्ध हिन्दू धर्मग्रंथ रामायण के अनुसार माना जाता है और ऐसा उल्लिखित भी है कि भगवान राम ने रावण को मारने के लिये देवी चंडी की पूजा की थी। लंका के राजा रावण के दस सिर थे| वह जाति से ब्राम्हण लेकिन राक्षस प्रवत्ति का था| एक बार उसकी बहन शूपर्णंखा की बेइज्जती का बदला लेने के लिये राम की पत्नी माता सीता का हरण कर लिया था। उसके बाद राम जी ने लंका पर चढ़ाई करके रावण को मारा उसी दिन से दशहरा का उत्सव मनाया जा रहा है।

दशहरा दस दिन तक मनाया जाता है क्योकी राम जी ने लंका पर चढ़ाई के लिए पहले देवी जी की उपासना की थी इसलिए पहले नौ दिन तक देवी दुर्गा की पूजा की जाती है जिसे नवरात्र कहते है| नवरात्र को दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है फिर १० वे दिन दशहरा मनाया जाता है| दसवें दिन लोग असुर राजा रावण का पुतला जला कर मनाते है। दशहरा का ये पर्व सितंबर और अक्टूबर के महीने में दिवाली के दो या तीन हफ्ते पहले पड़ता है। दशहरा या विजयदशमी के अवसर पर राम लीला या बड़े मेले का आयोजन होता है| जहाँ भगवान राम के नाटकीय मंचन के द्वारा ऐतिहासिक जीवन को दिखाया जाता है। विजयदशमी मनाने के पीछे राम लीला का उत्सव पौराणिक कथाओं को अंकित करता है। ये सीता माता के अपहरण के पूरे इतिहास को बताता है, असुर राजा रावण, उसके पुत्र मेघनाथ और भाई कुम्भकर्ण की हार और अंत तथा राजा राम की जीत को दर्शाता है। वास्तविक लोग राम, लक्ष्मण और सीता तथा हनुमान का किरदार निभाते है वहीं रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण का पुतला बनाया जाता है। अंत में बुराई पर अच्छाई की जीत को दिखाने के लिये रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले जला दिये जाते है और पटाखों के बीच इस उत्सव को और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
यह त्यौहार बहुत ही शुभ माना जाता है| क्योकी इस दिन बुराई की हार हुई और अच्छाई की जीत हुई इस लिय लोग बहुत से अच्छे कार्य भी करते है जैसे- वाहनादि खरीदना, मकान खरीदना, नयी दूकान को खोलना, पाठ, पूजा, हवन आदि करते है| इस त्यौहार की मान्यता हिन्दू धर्म में बहुत है|

पितृ पक्ष


पितृ पक्ष का त्यौहार आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावश्या तिथि तक मनाया जाता है। प्रतिपदा से अमावस्या जितने दिन तक होती है पितृपक्ष भी उतने दिन का होता है। पितरों के उद्धार के लिए मनाया जाने वाला त्यौहार बहुत ही महत्व का हैं। ग्रंथो के अनुसार माना जाता है की यमराज सभी पितरों को साल में एक बार पितृपक्ष के महीने में १५ दिन के लिए पाश मुक्त कर देते हैं। ये पितर अपने अपने पुत्रों के पास तिलांजलि की कामना के लिए आते हैं। जो सत्पुरुष अपने पितरों को श्रधांजलि देकर तृप्त कर देता हैं वह अपने पितरों से आशीर्वाद पाता है। इसके विपरीत जिस पितर को अपने घरवालों से कोई तर्पण नहीं मिलता वो लोक कुपित होकर अपने वंशजो को श्राप देते हैं। इससे पितृ दोष लगता है। और वे लोग श्राप के कारण हमेशा दुखी रहते है|

पितृपक्ष के महीने में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस पंद्रह दिन में कोई भी नया शुभ कार्य जैसे दूकान चालू करना, विवाह, माकन खरीदना, वाहनादि खरीदने की अनुमति नहीं होती है। यह त्यौहार पितृ पक्ष में पितरों के कल्याण के लिए मनाया जाता है। हमारे सनातन धर्म में १६ संस्कार प्रमुख हैं जिसमे अंतिम संस्कार सोलहवां संस्कार है। आदमी के कर्म के अनुसार यह संस्कार उसके आगे का भविष्य तय करता है। अच्छे कर्म करने वाले निष्काम कर्म योगी मुक्त हो जाते हैं। उनका जन्म नहीं होता वो परमात्मा से मिल जाते हैं। जो स्वर्ग की कामना से अच्छे कर्म करते हैं और कर्म फल को भोगने की कामना रखते हैं उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो लोग मृतुलोक में बरे कर्म करते हैं उन्हें नरक की प्राप्ति होती है। और वो हमेशा दुःख भोगते है|

किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। उस समय उसको पितरों के साथ रहने के लिए मिलाया जाता है और वह पितर लोक कुछ दिन के लिए रहता है। पितर लोक में जीव तब तक रहता है जबतक उसकी यथेष्ठ गति नहीं लग जाती। इस पितर लोक में रहने वाले पितरों को उनके मृत्यु या प्रथ्वी लोक की संतानो से पिंड और पानी मिलता है। जिससे उनका भरण पोषण होता है। पितरों को पिंड पानी देने का बिधान आपके प्रति दिन दैनिक पूजा पाठ से भी होता है। लेकिन माना जाता है कि पितर पक्ष में दिया गया पिंड दान बहुत शुभ होता है हमारे सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ साथ तीन ऋण भी बताये गए हैं। ये तीनो ऋण पृथ्वी पर जन्म लेने वाले सभी प्राणी के ऊपर होता है। देव ऋण, ऋषी ऋण और पितर ऋण, देव ऋण देवो की पूजा करने से दूर होता है, ऋषी ऋण वेद, ग्रन्थ पढ़ने से दूर होता है| और पितर ऋण पितरो को पितृ पक्ष में पिंड व् पानी देके दूर होता है| इसलिए मनुष्य को पितृ पक्ष में जरूर इन तीनो का आवाहन करना चाहिए|

गणेश चतुर्थी


गणेश चतुर्थी हिन्दू धर्म का एक बहुत प्रिय पर्व है। ये उत्सव पूरे भारत में बेहद भक्तिभाव और खुशी से मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी हिन्दू धर्म का अत्यधिक मुख्य तथा बहुत प्रसिद्ध पर्व है। इसे हर साल अगस्त या सितंबर के महीने में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। ये भगवान गणेश के जन्म दिवस के रुप में मनाया जाता है जो माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र है। ये बुद्धि और समृद्धि के भगवान है इसलिये इन दोनों को पाने के लिये लोग इनकी पूजा करते है। लोग गणेश की मिट्टी की प्रतिमा लाते है और चतुर्थी पर घर पर रखते है तथा 10 दिन तक उनकी भक्ति करते है और उसके बाद अनन्त चतुर्दशी के दिन अर्थात् 11वें दिन गणेश विसर्जन करते है।

इस त्यौहार में हर मंदिर में गणेश पूजन होता है, झाकिया, पूजा पाठ का आयोजन होता है| खासतौर से बच्चे भगवान गणेश को बहुत पसंद करते है और उनकी पूजा कर बुद्धि तथा सौभग्य का आशीर्वाद प्राप्त करते है। लोग इस पर्व की तैयारी एक महीने पहले, हफ्ते या उसी दिन से शुरु कर देते है। इस उत्सवी माहौल में बाजार भी बहुत जोर शोर से चलती नजर आती है| हर जगह दुकानें गणेश की मूर्तियों से भरी रहती है और लोगों के लिये प्रतिमा की बिक्री को बढ़ाने के लिये बिजली की रोशनी की जाती है।

भक्तगण भगवान गणेश को अपने घर ले आते है तथा पूरी आस्था से मूर्ती की स्थापना करते है। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि जब गणेश जी घर पर आते है तो ढ़ेर सारी सुख, समृद्धि, बुद्धि और खुशी ले आते है हालाँकि जब वो हमारे घर से प्रस्थान करते है तो हमारी सारी बाधाएँ तथा परेशानियों को साथ ले जाते है। भगवान गणेश को बच्चे बहुत प्रिय है और उनके द्वारा उन्हें मित्र गणेश बुलाते है। लोगों का समूह गणेश जी की पूजा करने के पंडाल तैयार करता है। वो लोग पंडाल को फूलों और प्रकाश के द्वारा आकर्षक रुप से सजाते है। आसपास के बहुत सारे लोग प्रतिदिन उस पंडाल में प्रार्थना और अपनी इच्छाओं के लिये आते है। भक्तगण भगवान गणेश को बहुत सारी चीजें चढ़ाते है जिसमें मोदक उनका सबसे पसंदीदा है। ये उत्सव 10 दिनों के लिये अगस्त और सितंबर में मनाया जाता है गणेश चतुर्थी पूजा दो प्रक्रियाओं को शामिल करती है; पहला मूर्ति स्थापना और दूसरा मूर्ति विसर्जन (इसे गणेश विसर्जन भी कहा जाता है)। हिन्दू धर्म में एक रीति प्राणप्रतिष्ठा जो कि मूर्ति में उनके पवित्र आगमन के लिये पूजा की जाती है तथा शोधसोपचरा जो भगवान को 16 तरीकों से सम्मान देना । 10 दिनों की पूजा के दौरान कपूर, लाल चन्दन, लाल फूल, नारियल, गुड़, मोदक और दुरवा घास चढ़ाने की प्रथा है। पूजा की समाप्ति के समय गणेश विसर्जन में लोगों भारी भीड़ विघ्नहर्ता को खुशी - खुशी विदा करती है। इस दस दिन में भगवान् गणेश के प्रति श्रद्धा भाव से पूजन अर्चन कर गणपति से प्रार्थना की जाती है, कि हमें बल बुद्धि और खुश रखना |

जन्माष्टमी



हिन्दू धर्म में जन्माष्टमी पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जो रक्षाबंधन के बाद भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह त्यौहार बहुत ही धूम- धाम से मनाया जाता है|

इस त्यौहार में प्रत्येक मंदिर व घर को सजाया जाता है और अपनी आस्था अनुसार भगवान् श्री कृष्ण को पंचामृत, माखन, आदि से भोग लगाते है| और कीर्तन, भजन व नृत्य, झाकियो का आयोजन कर आनंद लेते है|

जन्माष्टमी का त्यौहार मथुरा और वृन्दावन धाम में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है| यहाँ का पर्व दूर दूर तक विख्यात है|

यह प्राचीन कथा है कि कंस नाम का एक राजा था जो अपनी प्रजा पर बहुत ही अत्याचार करता था| उसकी एक बहन थी जिसका नाम देवकी था| कंस ने अपनी बहन की शादी वासुदेव से कर दी | देवकी की विदाई के दौरान एक आकाश मार्ग आवाज आयी की जिस बहन को तुम बहुत प्यार करते हो कंस उसी का 8 पुत्र तुम्हारा काल होगा| यह सुनकर कंस ने माता देवकी और वासुदेव को उसी क्षण कारागार में डाल दिया| उसके बाद कंस ने धीरे धीरे देवकी के 7 पुत्र मर दिए और जब 8 पुत्र का जन्म होने को आया तो भगवान् विष्णू की कृपा से कारागार के सारे पहरेदार सो गए देवकी व वासुदेव की हथकडिया खुल गयी, कराकर के ताले खुल गए तभी आकाशवाणी हुई की वासुदेव इस बच्चे को लेकर जाओ और गोकुल में यशोदा के घर जन्मी बच्ची से बदल लाओ| यह सुन कर वासुदेव कृष्ण को लेकर गए और बची को ले आये| उधर गोकुल में श्री कृष्ण के जन्म के उपलक्ष में खुशीया मनाई गयी| श्री कृष्ण का जन्म कंस को मारने के लिए हुआ था| ये विष्णू के अवतार थे| श्री कृष्ण में १६ कलाए थी| इन्होने अनेक प्रकार से मानव पर आये हुए संकट दूर किये | और इनके नाम से आज भी लोगो के संकट दूर होते है| तभी लोग इस उपलक्ष में कीर्तन, भजन, हवन व भण्डारे का आयोजन करते है|

रक्षाबंधन





रक्षाबंधन का त्योहार सनातन धर्म के लोग मनाते आ रहे है यह पर्व श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर अध्ययन और यज्ञ करते थे।श्रावण-पूर्णिमा को मासिक यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी । यज्ञ की समाप्ति पर यजमानों और शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधने की प्रथा थी । इसलिए इसका नाम रक्षा-बंधन प्रचलित हुआ ।
इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ब्राह्मण आज भी अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । बाद में इसी रक्षा-सूत्र को राखी कहा जाने लगा । कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए ब्राह्मण निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं | आज के युग में राखी प्रमुख रूप से भाई-बहन का पर्व माना जाता है । इस में बहन अपने भाई को राखी बांधती है और यह प्रार्थना करती है जब कोई मुशीबत हो तब मेरी सहायता करना| इस उपलक्ष में भाई बहिनों को उपहार देता है | महीने पूर्व से ही इस पर्व की बहन प्रतीक्षा करती है । इस अवसर पर विवाहित बहिनें ससुराल से मायके जाती हैं और भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं । वे भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं तथा राखी बाँधकर उनका मुँह मीठा कराती हैं । भाई प्रसन्न होकर बहन को कुछ उपहार देता है । प्रेम के साथ नया वस्त्र और धन देता है । परिवार में खुशी देखने को मिलाती है । बड़े बच्चों के हाथों में रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं रक्षाबंधन के इस अवसर पर बाजार में विशेष चहल-पहल होती है । हलवाई की दुकान पर बहुत भीड़ होती है । लोग उपहार देने के लिए तथा घर में प्रयोग के लिए मिठाइयों के पैकेट खरीदते हैं ।दुकानो पर कई प्रकार की रंग-बिरंगी राखियों देखने को मिलाती है| लोग तरह-तरह की राखी खरीदते हैं । यह एक भाई – बहन के प्रेम का त्यौहार है| जो बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है|

कुम्भ मेला


सनातन धर्म में कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के समय से चली आ रही है मंथन करते समय उसमे निकले अमृत का कलश कुछ स्थानों पर गिरा जैसे हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक के स्थानों पर ही गिरा था, इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। जबकि कुछ दस्तावेज बताते हैं कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था। कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस बारे में विद्वानों में अनेक भ्रांतियाँ हैं। वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ तथा अर्धकुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था। कुछ विद्वान गुप्त काल में कुंभ के सुव्यवस्थित होने की बात करते हैं। परन्तु प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 . के समय से प्राप्त होते हैं। बाद में श्रीमद आघ जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की।
कुंभ मेला किसी स्थान पर लगेगा यह राशि तय करती है। वर्ष 2013 में कुंभ मेला प्रयाग ईलाहाबाद में लगा था| यह मेला अगले 12 वर्ष के बाद पुन: 2025 में लगेगा|
हरिद्द्वार मेला


कुंभ के लिए जो नियम निर्धारित हैं उसके अनुसार प्रयाग में कुंभ तब लगता है जब माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में होते हैं और गुरू मेष राशि में होता है। यही संयोग वर्ष 2013 में 20 फरवरी को होने जा रहा है। 1989, 2001, 2013 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2025 में लगेगा। 

कुंभ योग के विषय में विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में बताया गया है कि जब गुरु कुंभ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब हरिद्वार में कुंभ लगता है। 1986, 1998, 2010 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला हरिद्वार में 2021 में लगेगा। 


सूर्य एवं गुरू जब दोनों ही सिंह राशि में होते हैं तब कुंभ मेले का आयोजन नासिक (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर लगता है। 1980, 1992, 2003 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2015 में लगेगा।  
नासिक मेला



गुरु जब कुंभ राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन में कुंभ लगता है। 1980,1992, 2004, के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2016 में लगेगा।  
उज्जैन मेला


कुंभ के मेले में सबसे महत्वपूर्ण ग्रहो को माना गया है क्योकी कुंभ के आयोजन में नवग्रहों में से सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए इन्हीं ग्रहों की विशेष स्थिति में कुंभ का आयोजन होता है। सागर मंथन के दौरान जब अमृत कलश प्राप्त हुआ था, तब अमृत घट को लेकर देवताओं और असुरों में खींचा तानी शुरू हो गयी थी| ऐसे में अमृत कलश से छलक कर अमृत की कुछ बूंदे जहां जहाँ  पर गिरी वहां वहां पर कुंभ मेला का आयोजन किया गया था| अमृत की खींचा तानी के समय चन्द्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। गुरू ने कलश को छुपा कर रखा। सूर्य देव ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इन्द्र के कोप से रक्षा की। इसलिए जब इन ग्रहों का संयोग एक राशि में होता है तब कुंभ का अयोजन होता है। क्योंकि इन चार ग्रहों के सहयोग से अमृत की रक्षा हुई थी। इसलिये 4 जगहों पर मेले का आयोजन किया गया क्योकि 4 जगह पर ही अमृत गिरा था |
यह मेला बहुत ही विशाल होता इस मेले में लोग बहुत दूर दूर से लोग आते है और स्नान कर पूजन-अर्चन कर मेले में आनंद लेते है| इस मेले में बहुत से संत महात्मा भी आते है जो तब तक रहते है जब तक मेला रहटा है| सबसे बड़ा मेला प्रयाग में होता है जिसे महाकुम्भ कहा जाता है|

राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जन्म दिवस 12 जनवरी

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