पितृ पक्ष का त्यौहार आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावश्या तिथि तक मनाया जाता है। प्रतिपदा से अमावस्या जितने दिन तक होती है पितृपक्ष भी उतने दिन का होता है। पितरों के उद्धार के लिए मनाया जाने वाला त्यौहार बहुत ही महत्व का हैं। ग्रंथो के अनुसार माना जाता है की यमराज सभी पितरों को साल में एक बार पितृपक्ष के महीने में १५ दिन के लिए पाश मुक्त कर देते हैं। ये पितर अपने अपने पुत्रों के पास तिलांजलि की कामना के लिए आते हैं। जो सत्पुरुष अपने पितरों को श्रधांजलि देकर तृप्त कर देता हैं वह अपने पितरों से आशीर्वाद पाता है। इसके विपरीत जिस पितर को अपने घरवालों से कोई तर्पण नहीं मिलता वो लोक कुपित होकर अपने वंशजो को श्राप देते हैं। इससे पितृ दोष लगता है। और वे लोग श्राप के कारण हमेशा दुखी रहते है|
पितृपक्ष के महीने में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस पंद्रह दिन में कोई भी नया शुभ कार्य जैसे दूकान चालू करना, विवाह, माकन खरीदना, वाहनादि खरीदने की अनुमति नहीं होती है। यह त्यौहार पितृ पक्ष में पितरों के कल्याण के लिए मनाया जाता है। हमारे सनातन धर्म में १६ संस्कार प्रमुख हैं जिसमे अंतिम संस्कार सोलहवां संस्कार है। आदमी के कर्म के अनुसार यह संस्कार उसके आगे का भविष्य तय करता है। अच्छे कर्म करने वाले निष्काम कर्म योगी मुक्त हो जाते हैं। उनका जन्म नहीं होता वो परमात्मा से मिल जाते हैं। जो स्वर्ग की कामना से अच्छे कर्म करते हैं और कर्म फल को भोगने की कामना रखते हैं उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो लोग मृतुलोक में बरे कर्म करते हैं उन्हें नरक की प्राप्ति होती है। और वो हमेशा दुःख भोगते है|
किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। उस समय उसको पितरों के साथ रहने के लिए मिलाया जाता है और वह पितर लोक कुछ दिन के लिए रहता है। पितर लोक में जीव तब तक रहता है जबतक उसकी यथेष्ठ गति नहीं लग जाती। इस पितर लोक में रहने वाले पितरों को उनके मृत्यु या प्रथ्वी लोक की संतानो से पिंड और पानी मिलता है। जिससे उनका भरण पोषण होता है। पितरों को पिंड पानी देने का बिधान आपके प्रति दिन दैनिक पूजा पाठ से भी होता है। लेकिन माना जाता है कि पितर पक्ष में दिया गया पिंड दान बहुत शुभ होता है हमारे सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ साथ तीन ऋण भी बताये गए हैं। ये तीनो ऋण पृथ्वी पर जन्म लेने वाले सभी प्राणी के ऊपर होता है। देव ऋण, ऋषी ऋण और पितर ऋण, देव ऋण देवो की पूजा करने से दूर होता है, ऋषी ऋण वेद, ग्रन्थ पढ़ने से दूर होता है| और पितर ऋण पितरो को पितृ पक्ष में पिंड व् पानी देके दूर होता है| इसलिए मनुष्य को पितृ पक्ष में जरूर इन तीनो का आवाहन करना चाहिए|

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