मोक्षदा एकादसी पूजन और उसकी विधि
अगहन (मार्गशीर्ष) माह के शुक्ल पक्ष को आने वाली यह एकादशी मनुष्य को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कराती है। इस व्रत को धारण करने वाला मनुष्य जीवन भर सुख भोगता है और अपने समय में निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त करता है|

पद्मपुराणमें भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते
हैं-इस दिन तुलसी
की मंजरी, धूप-दीप आदि से
भगवान दामोदर का
पूजन करना चाहिए।
मोक्षदाएकादशी बडे-बडे पातकों का
नाश करने वाली
है। इस दिन
उपवास रखकर श्रीहरिके नाम का संकीर्तन,
भक्तिगीत, नृत्य
करते हुए रात्रि
में जागरण करें।
पूर्वकाल में वैखानस नामक
राजा ने पर्वत
मुनि के द्वारा
बताए जाने पर
अपने पितरोंकी मुक्ति
के उद्देश्य से
इस एकादशी का
सविधि व्रत किया
था। इस व्रत
के पुण्य-प्रताप से राजा
वैखानस के पितरोंका नरक से उद्धार
हो गया। जो
इस कल्याणमयीमोक्षदा एकादशी का
व्रत करता है, उसके सारे पाप
नष्ट हो जाते
हैं। प्राणियों को
भवबंधन से मुक्ति
देने वाली यह
एकादशी चिन्तामणि के
समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने
वाली है। मोक्षदा एकादशी की पौराणिक कथा पढने-सुनने से वाजपेययज्ञ का पुण्यफलमिलता है।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के
दिन ही कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को
श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश दिया
था। अत:यह तिथि गीता
जयंती के नाम
से विख्यात हो
गई। इस दिन
से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करें तथा
प्रतिदिन थोडी देर
गीता अवश्य पढें।
गीतारूपीसूर्य के प्रकाश
से अज्ञानरूपीअंधकार नष्ट हो
जाएगा।
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