आशा भगवती व्रत पूजन और उसकी विधि

आशा भगवती व्रत पूजन और उसकी विधि

 

आशा भोगती का व्रत श्राद्ध में अष्टमी तिथि से आरंभ होता है और आठ दिनों तक चलता है|


 

 

आशा भोगवती की कहानी बहुत समय पहले हिमाचल में एक राजा रहता था और उसकी दो बेटियाँ थी| एक नाम गौरा तो दूसरी का नाम पार्वती था| एक दिन राजा ने दोनो बेटियों को बुलाकर पूछा कि तुम किस के भाग का खाती हो? इस पर पार्वती जी बोली कि मैं अपने भाग का खाती हूँ और गौरा ने कहा कि मैं तुम्हारे भाग का खाती हूँ| दोनो की बातें सुनकर राजा ने ब्राह्मण को बुलाकर कहा कि पार्वती के लिए भिखारी वर ढूंढना और गौरा के लिए राजकुमार वर ढूंढना| ब्राह्मण ने गौरा को सुंदर राजकुमार दे दिया और पार्वती जी को भिखारी वर दे दिया|

भिखारी का रुप बनाकर शिवजी बैठे थे| राजा ने पार्वती जी की शादी के लिए कोई तैयारी नहीं कर रखी थी जबकि गौरा के विवाह के लिए बहुत सी तैयारियाँ कर रखी थी| गौरा की बारात आने पर बारात की बहुत खातिरदारी की गई| बड़े ही धूमधाम से विवाह संपन्न किया गया| लेकिन पार्वती जी की बारात आई तब कुछ भी नहीं दिया गया और बिना कुछ दिए कन्यादान कर दिया गया| शिवजी पार्वती जी को लेकर कैलाश पर्वत चले गए| जब पार्वती जी जाने लगी तो जहाँ पैर रखती वही की दूब जल जाती| शिवजी ने ब्राह्मणों से पूछा कि ऎसा क्यूँ हो रहा है? ब्राह्मण बोले कि पार्वती जी की भाभियाँ आशा भोगती का व्रत करती थी| उन्होंने अपने पीहर जाकर उद्यापन कर दिया है| पार्वती जी भी अपने पीहर जाकर उद्यापन करेंगी तब इनका यह दोष खतम होगा|

ब्राह्मणों की बात सुनकर शिवजी बोले कि हम वहाँ धूमधाम से जाएंगे और आशा भोगती व्रत का उद्यापन पार्वती जी से कराएंगे, नहीं तो पार्वती जी के पीहर वालों को कैसे पता चलेगा कि पार्वती जी सुखी हैं| शिवजी, पार्वती जी के साथ बहुत सारे गहने पहनकर चल दिए| रास्ते में उन्होंने देखा कि किसी राजा कि रानी को बच्चा होने वाला है इसलिए वह बहुत परेशान थी और भीड़ भी बढ़ती जा रही थी| पार्वती जी ने पूछा कि इतनी भीड़ क्यूँ है़? लोगों ने उन्हें सब बात बता दी| इस पर पार्वती जी शिव से कहने लगी कि मेरी कोख बाँध दो| शिवजी ने बहुत मना किया लेकिन पार्वती जी ने जिद पकड़ ली थी और अंतत: शिव ने पार्वती जी की कोख बाँध दी|

इधर गौरा अपनी ससुराल में बहुत दुखी थी| पार्वती जब अपने पीहर पहुँची तब कोई उन्हें पहचान ही नहीं पाया तो पार्वती जी ने अपने बारे में बताया जिसे सुनकर हर कोई बहुत प्रसन्न था| इस बार फिर पार्वती जी के पिता ने उनसे पूछा कि तुम किस के भाग का खाती हो? पार्वती जी ने फिर वही जवाब दिया कि मैं अपने भाग का खाती हूँ तभी मैं बहुत खुश हूँ| पार्वती जी की भाभियाँ आशा भोगती का उद्यापन कर रही थी| पार्वती जी बोली कि क्या मेरे उद्यापन की तैयारियाँ नहीं है? मैं भी उद्यापन कर देती! इस पर भाभियों ने कहा कि तुम्हें किस चीज की कमी है? शिवजी अपने आप सारी तैयारी कर देगें|

भाभियाँ दासी से बोली कि शिवजी कुएं के पास बैठे हैं, उन्हें कहो कि वे पार्वती जी के आशा भोगती व्रत के उद्यापन की तैयारी कर दें| दासी ने शिवजी से जाकर सारी बात कह दी| इस पर शिवजी ने दासी को एक अंगूठी दी और कहा कि इससे जो तुम मांगोगी वही मिलेगा| दासी अंगूठी लेकर चली गई और पार्वती जी को शिव का संदेश सुना दिया| पार्वती जी ने सारी तैयारी कर ली. पार्वती जी की सभी तैयारी देख भाभियाँ कहने लगी कि हम 8 महीने से इस व्रत की तैयारी कर रहे हैं तब भी वह अभी तक पूरी नहीं हो पाई और इसने जरा सी देर में सभी तैयारी कर ली|

शिवजी ने पार्वती जी से कहा कि अब घर चलो! इस पर ससुर ने शिवजी को जीमने के लिए बुलाया तो शिवजी बहुत से गहने पहन और छोटा सा रुप बनाकर जीमने गए| अब बहुत से लोग बोलने भी लगे कि पार्वती जी को भिखारी वर ढूंढकर दिया लेकिन पार्वती जी अपने भाग से खूब राज कर रही हैं| शिवजी के जीमने के बाद सारा खाना ही खतम हो गया और पार्वती जी खाने लगी तो कुछ भी नहीं बचा था| एक सब्जी उबली हुई पड़ी थी तो पार्वती जी उसी को खाकर ठंडा पानी पीकर वहाँ से चलने लगी| रास्ते में बहुत गर्मी होने से वह एक पेड़ के नीचे बैठ गई| शिवजी ने पूछा कि तुम क्या खाकर आई हो? इस पर पार्वती जी ने कहा कि जो आपने खाया वहीं मैने भी खाया लेकिन शिव सब जानते थे वह हँसकर बोले कि तुम तो सब्जी खाकर ठंडा पानी पीकर आई हो| इस पर पार्वती जी ने कहा कि आपने मेरा भेद तो खोल दिया है लेकिन किसी और का भेद ना खोलना|

अब पार्वती जब चलने लगी तो सूखी हुई दूब हरी होने लगी| शिवजी ने सोचा कि चलो दोष मिट गया| अब पार्वती जी बोली कि आप मेरी कोख खोल दो| शिवजी बोले कि अब कैसे खोलूँ? मैने तो पहले ही मना कर दिया था| जब दोनो कुछ आगे चले तो वही रानी कुआं पूजने रही थी| पार्वती जी ने पूछा कि यह क्या हो रहा है? शिव जी बोले कि यह वही रानी है जो दुख पा रही थी| अब इसे लड़का हो गया है इसलिए यह कुंआ पूजने जा रही है| पार्वती जी फिर बोली कि महाराज मेरी कोख तो खोल दो| शिवजी फिर बोले कि मैने तो पहले ही मना किया था कि कोख मत बंधवाओ लेकिन तुमने जिद कर ली|

अब जादू से सारी चीजें निकालकर गणेश जी बनाएं तो पार्वती जी ने सभी नेग किए और कुंआ पूजन भी किया| अब पार्वती जी बोली कि मैं तो सुहाग बाँटूगी तो सारे देश में शोर मच गया कि पार्वती जी सुहाग बाँट रही हैं| जिसको लेना हो ले ले| साधारण मानव तो दौड़कर सुहाग ले गए लेकिन ब्राह्मणी और वैश्य स्त्रियाँ देर से सुहाग लेने पहुंची. अब पार्वती जी ने कहा कि मैने तो सारा सुहाग बाँट दिया लेकिन शिवजी बोले कि इन्हें तो सुहाग देना पड़ेगा तब पार्वती जी ने अपने नाखूनों में मेहंदी निकाली, माँग में से सिन्दूर निकाला, बिन्दी में से रोली, आँखों से काजल, सबसे छोटी अंगुली से छींटा दे दिया| ऎसा करने से उन्हें भी सुहाग मिल गया| सारे नगर में जय-जयकार हो उठी कि पार्वती जी ने सभी को सुहाग दिया है| इस व्रत को कुंवारी लड़कियाँ ही करती है और इसके बाद बिन्दायक जी कथा भी कही जाती है|

 

व्रत व पूजन विधि- अष्टमी के दिन आठ कोने रसोईघर के पोते जाते हैं| आशा भोगती की कहानी सुनने के बाद इन आठ कोनों पर दूध, 8 रुपये, 8 रोली के छीटें, मेहंदी के आठ छींटे, काजल की आठ टिक्की, एक-एक सुहाली और एक दीपक जलाएँ. इस व्रत के आखिरी दिन एक-एक फल, एक सुहाग पिटारी चढ़ाएँ| 8 दिन तक इसी तरह पूजा की जाती है और आखिरी दिन व्रत किया जाता है| व्रत करने पर आठ सुहाली का बायना निकाला जाता है| 8 साल तक इसी व्रत के साथ पूजा करनी चाहिए और नवें वर्ष इस व्रत का उद्यापन कर देना चाहिए| आठ सुहाग पिटारी में सुहाग की सारी चीजें डाल दें और आठ सुहाली डालकर सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर पैर छूते हैं| पूजा करने के बाद ही कहानी सुनी जाती है|

 

 


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