वटसावित्री व्रत पूजन और उसकी विधि

 

वटसावित्री व्रत पूजन और उसकी विधि

इस दिन विवाहित महिलाए अपने पति की लम्बी आय के लिए इस व्रत को करती है | वट सावित्री व्रत किस दिन करना चाहिए इसमें किंचित विवाद है स्कंदऔर भविष्योत्तरपुराण के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा पर करने का विधान है। निर्णयामृतइत्यादि ग्रंथों के अनुसार वट सावित्री व्रत पूजा ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के अमावस्या पर करने का विधान है। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ शुक्ल अमावस्या को ही किया जाता है।


 

ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट सावित्री व्रत के पूजन का विधान है। इस दिन महिलाएँ अपने सुखद वैवाहिक जीवन की कामना से वटवृक्ष की पूजा-अर्चना कर व्रत करती हैं। वट सावित्री व्रत में वटऔर सावित्रीदोनों का विशेष महत्व माना गया है।

वटवृक्ष विशेषताएं-

मृत्यु के देवता यमराज ने जब सावित्री के पति सत्यवान के प्राण का हरण किये तब सावित्री ने अपने पति के प्राण की रक्षा के लिए यमराज से तीन दिन शास्त्रार्थ की उसके बाद प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को पुनः जीवित कर दिया। यमराज और सावित्री के मध्य शास्त्रार्थ वटवृक्ष के नीचे हुई थी इसी कारण सावित्री के साथ वट वृक्ष का भी संबंध जुड़ गया और बरगद का महत्त्व बढ़ गया।

1.       प्रयाग के अक्षय्य वटके नीचे श्रीराम सीताजी एवं लक्ष्मणजी ने विश्राम किया था। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नृसिंह, नील एवं माधव का निवास स्थान वटवृक्ष है

2.       वटवृक्ष का सम्बन्ध शिव तथा शनि देव से भी है और दोनों देव न्याय प्रिय है लोक प्रसिद्ध कथा के अनुसार इसी वृक्ष के नीचे पतिव्रता सावित्री को यमराज से न्याय की प्राप्ति हुई थी ।

3.       कहा जाता है कि प्रलयकाल में बाल मुकुंद ने वटपत्र पर शयन किया था ।

4.       शास्त्रों में पीपल, बरगद तथा शमी को पवित्र वृक्ष बताया गया है। यज्ञ में इन वृक्षों के लकड़ी का प्रयोग करने से सभी प्रकार के मनोकामना की पूर्ति के साथ-साथ वातावरण भी शुद्ध होता है।

5.       सभी पवित्र वृक्षों में वृक्षों में वटवृक्ष की उम्र अधिक होती है।

6.       बरगद वृक्ष में रहने वाले जटा शिवजी की जटा के अनुरूप ही है।

7.       स्कन्दपुराण में कहा गया है, ‘अश्वत्थरूपी विष्णु: स्याद्वरूपी शिवो यत:अर्थात् पीपलरूपी विष्णु व जटारूपी शिव हैं। वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में विष्णु और डालियों एवं पत्तों में शिव का वास होता है।  इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।

 

कथा- कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति की प्राण रक्षा के लिए निराहार व्रत किया और विष्णु की आराधना करने लगी। अमावस्या के दिन सत्यवान का प्राण लेने यमराज आए, लेकिन सावित्री की भक्तिसे प्रसन्न होकर सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया। जब यमराज पति का प्राण लेकर जाने लगे, तो वह पीछे लग गई। आखिरकार यमराज ने प्राण लौटाना पड़ा | तभी से लोग सावित्री वट पूजा करते है|

पूजन विधि- सामान्य पूजा के अनुसार इस दिन महिलाएँ सुबह स्नान कर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन निराहार रहते हुए सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष में कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। वट पूजा के समय फल, मिठाई, पूरी, पुआ भींगा हुआ चना और पंखा चढ़ाती हैं उसके बाद सत्यवान सावित्री की कथा सुनती हैं। पुनः सावित्री की तरह वट के पत्ते को सिर के पीछे लगाकर घर पहुंचती हैं। फिर पति को जल पिलाकर व्रत तोड़ती है| विशेष रूप में इस पूजन में स्त्रियाँ चौबीस बरगद फल (आटे या गुड़ के) और चौबीस पूरियाँ अपने आँचल में रखकर बारह पूरी बारह बरगद वट वृक्ष में चढ़ा देती हैं। वृक्ष में एक लोटा जल चढ़ाकर हल्दी-रोली लगाकर फल-फूल, धूप-दीप से पूजन करती हैं। कच्चे सूत को हाथ में लेकर वे वृक्ष की बारह परिक्रमा करती हैं। हर परिक्रमा पर एक चना वृक्ष में चढ़ाती जाती हैं। और सूत तने पर लपेटती जाती है| परिक्रमा के दौरान वट पर पूड़ी श्रद्धा अनुसार चड़ा सकते है|  
इसके पीछे यह मिथक है कि सत्यवान जब तक मरणावस्था में थे तब तक सावित्री को अपनी कोई सुध नहीं थी लेकिन जैसे ही यमराज ने सत्यवान को जीवित कर दिए तब सावित्री ने अपने पति सत्यवान को जल पिलाकर स्वयं वटवृक्ष की बौंडी खाकर जल ग्रहण की थी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जन्म दिवस 12 जनवरी

  राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जन्म दिवस प्रत्तेक वर्ष 12 जनवरी को भारत में पूरे उत्साह और खुशी के स...