श्राद्ध पूजन और उसकी विधि
हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार या प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, इसलिए वर्ष में एक बार अपने पितरो को याद करे और पिण्ड विसर्जन करे |

ऐसा
माना जाता है
कि पितर लोग, यथा–वसु, रुद्र एवं आदित्य, जो कि
श्राद्ध के देवता हैं, श्राद्ध से
संतुष्ट होकर मानवों
के पूर्वपुरुषों को संतुष्टि
देते हैं।इस अवसर
पर यमराज सभी
पितरो को १५
दिन के लिए
आजाद करते है
|
भाद्रपद में ही श्राद्ध कराये हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।
जरूर कराये
श्राद्ध हर
व्यक्ति के तीन
पूर्वज पिता, दादा और
परदादा क्रम से
वसु, रुद्र और
आदित्य के समान माने
जाते हैं। श्राद्ध
के वक़्त वे
ही अन्य सभी
पूर्वजों के प्रतिनिधि
माने जाते हैं।
ऐसा माना जाता
है कि वे
श्राद्ध कराने वालों
के शरीर में
प्रवेश करके और
ठीक ढंग से
रीति-रिवाजों के
अनुसार कराये गये
श्राद्ध-कर्म से
तृप्त होकर वे
अपने वंशधर को
सपरिवार सुख-समृद्धि
और स्वास्थ्य का
आर्शीवाद देते हैं।
श्राद्ध-कर्म में
उच्चारित मन्त्रों और आहुतियों
को वे अन्य
सभी पितरों तक
ले जाते हैं।
श्राद्धों
का पितरों के साथ अटूट
संबंध है। पितरों के बिना श्राद्ध की कल्पना नहीं
की जा सकती। श्राद्ध पितरों को
आहार पहुँचाने का
माध्यम मात्र है।
मृत व्यक्ति के
लिए जो श्रद्धायुक्त होकर तर्पण, पिण्ड, दानादि किया जाता
है, उसे 'श्राद्ध' कहा जाता है
और जिस 'मृत व्यक्ति' के एक वर्ष तक के
सभी और्ध्व दैहिक क्रिया कर्म संपन्न हो जायें, उसी की 'पितर' संज्ञा हो जाती
है 'मेरे वे पितर
जो प्रेतरूप हैं, तिलयुक्त जौ के पिण्डों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर
तिनके तक, चर हो
या अचर, मेरे द्वारा दिये जल से
तृप्त हों।'
श्राद्ध को समझे
तो प्रथा वैदिक काल के
बाद शुरू हुई
और इसके मूल
में इसी श्लोक की
भावना है। उचित
समय पर शास्त्रसम्मत
विधि द्वारा पितरों
के लिए श्रद्धा
भाव से मन्त्रों
के साथ जो
दान-दक्षिणा आदि, दिया जाय, वही श्राद्ध
कहलाता है। 20 अंश रेतस
(सोम) को 'पितृॠण' कहते
हैं। 28 अंश रेतस
के रूप में
'श्रद्धा' नामक मार्ग
से भेजे जाने
वाले 'पिण्ड' तथा
'जल' आदि के
दान को श्राद्ध
कहते हैं। इस
श्रद्धावान मार्ग का
संबंध मध्याह्न काल
में श्राद्ध करने
का विधान है।
श्राद्ध के लिए उपस्थित हो ये चीजे
·
श्राद्ध के लिए उचित द्रव्य हैं- तिल, उड़द, चावल, जौ, जल, मूल, (जड़युक्त सब्जी) और फल।
·
तीन चीज़ें
शुद्धिकारक हैं - पुत्री का पुत्र, तिल और नेपाली कम्बल या कुश।
·
तीन बातें
प्रशंसनीय हैं - सफ़ाई, क्रोधहीनता और चैन शीघ्रता|
·
श्राद्ध में
महत्त्वपूर्ण बातें - अपरान्ह का समय, कुशा, श्राद्धस्थली की
स्वच्छ्ता, उदारता से भोजन आदि
की व्यवस्था और अच्छे ब्राह्मण की उपस्थिति।
ऐसा
माना जाता
है कि व्यक्ति मर
कर सबसे पहले कौए का जन्म
लेता है और
ऐसी मान्यता है
कि कौओं को
खाना खिलाने से
पितरों को खाना
मिलता है। इसी
कारण श्राद्ध पक्ष
में कौओं का
विशेष महत्त्व है
और प्रत्येक श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर
सबसे पहले कौओं
को खाना खिलाया जाता है। जो
व्यक्ति श्राद्ध कर्म
कर रहा है
वह एक थाली
में सारा खाना
परोसकर अपने घर
की छत पर
जाता है और
ज़ोर ज़ोर से
'कोबस कोबस' कहते हुए कौओं
को आवाज़ देता
है। थोड़ी देर
बाद जब कोई
कौआ आ जाता
है तो उसको
वह खाना परोसा जाता है। पास
में पानी से
भरा पात्र भी
रखा जाता है।
जब कौआ घर
की छत पर
खाना खाने के
लिए आता है
तो यह माना
जाता है कि
जिस पूर्वज का
श्राद्ध है वह
प्रसन्न है और
खाना खाने आ
गया है। कौए
की देरी व
आकर खाना न
खाने पर माना
जाता है कि
वह पितर नाराज़ है और फिर
उसको राजी करने
के उपाय किए
जाते हैं। इस
दौरान हाथ जोड़कर किसी भी ग़लती के लिए माफ़ी माँग ली जाती
है और फिर
कौए को खाना
खाने के लिए
कहा जाता है।
जब तक कौआ
खाना नहीं खाता, व्यक्ति के मन को
प्रसन्नता नहीं मिलती। इस तरह श्राद्ध पक्ष में कौओं
की भी पौ
बारह है।
1. ब्रह्म-यज्ञ - प्रतिदिन
अध्ययन और अध्यापन करना ही ब्रह्म-यज्ञ
है।
2. देव-यज्ञ - देवताओं
की प्रसन्नता हेतु
पूजन-हवन आदि करना।
3. पितृ-यज्ञ - 'श्राद्ध' और 'तर्पण' करना ही पितृ-यज्ञ है।
4. भूत-यज्ञ - 'बलि' और 'वैश्व देव' की प्रसन्नता हेतु जो पूजा की जाती है, उसे 'भूत-यज्ञ' कहते हैं।
5. मनुष्य-यज्ञ - इसके
अन्तर्गत 'अतिथि-सत्कार' आता है।
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