रक्षाबंधन का त्योहार सनातन धर्म के लोग मनाते आ रहे है यह पर्व श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर अध्ययन और यज्ञ करते थे।श्रावण-पूर्णिमा को मासिक यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी । यज्ञ की समाप्ति पर यजमानों और शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधने की प्रथा थी । इसलिए इसका नाम रक्षा-बंधन प्रचलित हुआ ।
इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ब्राह्मण आज भी अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । बाद में इसी रक्षा-सूत्र को राखी कहा जाने लगा । कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए ब्राह्मण निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं | आज के युग में राखी प्रमुख रूप से भाई-बहन का पर्व माना जाता है । इस में बहन अपने भाई को राखी बांधती है और यह प्रार्थना करती है जब कोई मुशीबत हो तब मेरी सहायता करना| इस उपलक्ष में भाई बहिनों को उपहार देता है | महीने पूर्व से ही इस पर्व की बहन प्रतीक्षा करती है । इस अवसर पर विवाहित बहिनें ससुराल से मायके जाती हैं और भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं । वे भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं तथा राखी बाँधकर उनका मुँह मीठा कराती हैं । भाई प्रसन्न होकर बहन को कुछ उपहार देता है । प्रेम के साथ नया वस्त्र और धन देता है । परिवार में खुशी देखने को मिलाती है । बड़े बच्चों के हाथों में रक्षा-सूत्र बाँधते हैं । घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं रक्षाबंधन के इस अवसर पर बाजार में विशेष चहल-पहल होती है । हलवाई की दुकान पर बहुत भीड़ होती है । लोग उपहार देने के लिए तथा घर में प्रयोग के लिए मिठाइयों के पैकेट खरीदते हैं ।दुकानो पर कई प्रकार की रंग-बिरंगी राखियों देखने को मिलाती है| लोग तरह-तरह की राखी खरीदते हैं । यह एक भाई – बहन के प्रेम का त्यौहार है| जो बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है|

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