बरूथनी एकादसी पूजन और उसकी विधि

 

बरूथनी एकादसी पूजन और उसकी विधि

वैशाख मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी बरुथनी एकादशी के नाम से जानी जाती है. यह व्रत सुख सौभाग्य का प्रतीक है. इस दिन जरुरतमंद को दान देने से करोडों वर्ष तक ध्यान मग्न होकर तपस्या करने तथा कन्यादान के भी फलों से बढकर बरूथनी एकादशी व्रत के फल कहे गये है. बरूथनी एकादशी करने वाले व्यक्ति को खासतौर पर उस दिन दातुन का प्रयोग करने, परनिंदा करने, क्रोध करने, और असत्य बोलने से बचना चाहिए. इसके अतिरिक्त इस व्रत में तेल युक्त भोजन भी नहीं किया जाता है. इसकी कथा सुनने से सौ ब्रह्मा हत्याओं का दोष नष्ट होता है. इस प्रकार यह व्रत बहुत ही फलदायक कहा गया है


 

कथा- पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर ने जब श्री कृष्ण से पूछा कि भगवन् वैसाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को क्या कहते हैं और इस व्रत का क्या विधान एवं महत्व है तब श्री कृष्ण ने पाण्डु पुत्र सहित मानव कल्याण के लिए इस व्रत का वर्णन किया।

श्री कृष्ण ने कहा है वैसाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी का बड़ा महात्म्य है। जो भक्त श्री विष्णु में मन को लगाकर श्रद्धा पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखता है उसे दस हजार वर्ष तक तपस्या करने का पुण्यफल प्राप्त होता है। वरूथिनी एकादशी के व्रत से दानों में जो उत्तम दान कन्या दान कहा गया है उसका फल मिलता है।माधव यह भी कहते है कि पृथ्वी पर मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले चित्रगुप्त जी भी इस एकदशी के व्रत के पुण्य को लिखने में असमर्थ हैं। पापी से पापी व्यक्ति भी इस व्रत का पालन करे तो उसके पाप विचार धीरे धीरे लोप हो जाते हैं व स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है।

पृथ्वी के राजा मान्धाता ने वैसाख कृष्ण पक्ष में एकादशी का व्रत रखा था जिसके फलस्वरूप मृत्यु पश्चात उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। त्रेतायुग में जन्मे राम के पूर्वज इच्छवाकु वंश के राजा धुन्धुमार को भगवान शिव ने एक बार श्राप दे दिया था। धुन्धुमार ने तब इस एकादशी का व्रत रखा जिससे वह श्राप से मुक्त हो कर उत्तम लोक को प्राप्त हुए।

पूजन विधि -श्री कृष्ण द्वारा व्रत के महात्मय को सुनने के पश्चात युधिष्ठिर बोले हे गुणातीत हे योगेश्वर अब आप इस व्रत का विधान जो है वह सुनाइये। युधिष्ठिर की बात सुनकर श्री कृष्ण कहते हैं हे धर्मराज इस व्रत का पालन करने वाले को दशमी के दिन स्नानादि से पवित्र होकर भगवान की पूजा करनी चाहिए। इस दिन कांसे के बर्तन, मसूर दाल, मांसाहार, शहद, शाक, उड़द, चना, का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रती को इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और स्त्री प्रसंग से दूर रहना चाहिए। आत्मिक शुद्धि के लिए पुराण का पाठ और भग्वद् चिन्तन करना चाहिए।

एकादशी के दिन प्रात: स्नान करके श्री विष्णु की पूजा विधि सहित करनी चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का जाप एवं उनकी कथा का रसपान करना चाहिए। श्री विष्णु के निमित्त निर्जल रहकर व्रत का पालन करना चाहिए। किसी के लिए अपशब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए व परनिन्दा से दूर रहना चाहिए। रात्रि जागरण कर भजन, कीर्तन एवं श्री हरि का स्मरण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात स्वयं तुलसी से परायण करने के पश्चात अन्न जल ग्रहण करना चाहिए।

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बरूथनी एकादशी व्रत की दूसरी कथा- प्राचीन समय में नर्मदा तट पर मान्धाता नामक राजा राय सुख भोग रहा था| राजकाज करते हुए भी वह अत्यन्त दानशील और तपस्वी था| एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था| उसी समय एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा| थोडी देर बाद वह राजा को घसीट कर वन में ले गया| तब राजा ने घबडाकर, तपस्या धर्म के अनुकुल क्रोध न करके भगवान श्री विष्णु से प्रार्थना की भक्त जनों की बाद शीघ्र सुनने वाले श्री विष्णु वहां प्रकट हुए़| तथा भालू को चक्र से मार डाला| राजा का पैर भालू खा चुका था. इससे राजा बहुत ही शोकाकुल था| विष्णु जी ने उसको दु:खी देखकर कहा कि हे वत्स, मथुरा में जाकर तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा बरूथनी एकादशी का व्रत करके करों, इसके प्रभाव से तुम पुन: अंगों वाले हो जाओगें| भालू ने तुम्हारा जो अंग काटा है, वह अंग भी ठिक हो जायेगा| यह तुम्हारा पैर पूर्वजन्म के अपराध के कारण हुआ है| राजा ने इस व्रत को पूरी श्रद्धा भाव से किया और वह फिर से सुन्दर अंगों वाला हो गया |  

व्रत के दिन ध्यान रखे ये बाते कि-

1. कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए | 
2. मांस नहीं खाना चाहिए | 
3. मसूर की दान नहीं खानी चाहिए |  
4. चना नहीं खाना चाहिए |  
5. करोदें नहीं खाने चाहिए |  
6. शाक नहीं खाना चाहिए |  
7. मधु नहीं खाना चाहिए |  
8. दूसरे से मांग कर अन्न नहीं खाना चाहिए| 
9. दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए|  
10. वैवाहिक जीवन में संयम से काम लेना चाहिए |

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