कोकिला व्रत पूजन और उसकी विधि
आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि से कोकिला व्रत आरंभ होता है जो श्रावण पूर्णिमा को समाप्त होता है। कई बहनें कोकिला-व्रत करती हैं। कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कान पर पड़े तब ही भोजन लेना, ऐसा यह व्रत है।

शास्त्रों के अनुसार यह व्रत पहली बार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए किया था। पार्वती रूप में जन्म लेने से पहले पार्वती कोयल बनकर दस हजार सालों तक नंदन वन में भटकती रही। शाप मुक्त होने के बाद पार्वती ने कोयल की पूजा की इससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और पत्नी के रूप में पार्वती को स्वीकार किया।
शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से हुआ था। प्रजापति शिव को पसंद नहीं करता था यह जानते हुए भी सती ने शिव से विवाह कर लिया। इससे प्रजापति सती से नाराज हो गया।
एक बार प्रजापति ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवी-देवताओं को बुलाया लेकिन शिव और सती को न्योता नहीं भेजा। सती के मन में पिता के यज्ञ को देखने की इच्छा हुई और वह शिव से हठ करके दक्ष के यज्ञ स्थल पर पहुंच गयी। इससे दक्ष ने शिव और सती का बहुत अपमान किया। सती अपमान सहन नहीं कर सकी और यज्ञ कुण्ड में कूद कर जल गयी। इसके बाद शिव ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और हठ करके प्रजपति के यज्ञ में शामिल होने के कारण सती को श्राप दिया कि वह दस हजार सालों तक कोयल बनकर नंदन बन में रहे। कोकिला व्रत के विषय में मान्यता है कि इससे सुयोग्य पति की प्राप्ति होती है। विवाहित स्त्रियां इस व्रत का पालन करती हैं तो उनके पति की आयु बढ़ती है। घर में वैभव और सुख की वृद्धि होती है। इस व्रत को सौन्दर्य प्रदान करने वाला व्रत भी माना जाता है|
इसके अगले आठ दिनों तक पिसी हुई वच को जल में मिलाकर स्नान करें और अंतिम छह दिनों में तिल, आंवला और सर्वऔषधि से स्नान करना चाहिए। प्रत्येक दिन स्नान के बाद कोयल की पूजा करें और अंतिम दिन कोयल को सजाकर उसकी पूजा करें। पूजा करने के बाद ब्राह्मण अथवा सास स-श्वसुर को कोयल दान कर दें।
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