कुशोत्पाटनी अमावस्या पूजन और उसकी विधि

 

कुशोत्पाटनी अमावस्या पूजन और उसकी विधि

भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अमावस्या को कुशोत्पाटनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पुरोहित पार्श्वस्थ नदियों, तालाबों आदि से कुशा लाकर घर पर रख लेते हैं और साल भर अपने धार्मिक कार्यों के लिए उनका प्रयोग करते हैं। ऐसा कहा जाता हिंदुओं के सभी धार्मिक क्रियाकलापों में कुश और पुष्प का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है। कुश या कुशा घास को ऊर्जा का कुचालक माना जाता है। इसीलिए पूजा पाठ के लिए कुशा के आसन पर बैठकर पूजन का विधान है। चूंकि इस पर बैठकर पूजा करने से साधक की ऊर्जा का क्षय नहीं होता और उसकी ऊर्जा पृथ्वी के अंदर नहीं जाती।


 

हमारे शास्त्रों में भी कुश को दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला, तत्काल फल देने वाली औषधि और आयु की वृद्धि करने वाला बताया गया है। यही कारण है कि सूर्य और चंद्रग्रहण के समय इसी कुशा को भोजन तथा पानी में डाल दिया जाता है ताकि ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुशा से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं और भोजन पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता। कुशा की उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि प्राचीन काल में जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा। उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे। यही रोम कुश के रूप में प्रकट हुए।

क्या है कुशा उत्पाटन का कारण: कुशा का उत्पाटन यानी उखाड़ना कुशोत्पाटन कहलाता है। भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अमावस्या को कुशोत्पाटनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पुरोहित पार्श्वस्थ नदियों, तालाबों आदि से कुशा लाकर घर पर रख लेते हैं और साल भर अपने धार्मिक कार्यों के लिये उनका प्रयोग करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि कुशा को तो कभी भी उखाड़ा जा सकता है, तो फिर इस अमावस्या पर क्या विशेष बात है। ऐसा कहा जाता है कि किसी सामान्य दिन यदि कुशा को उखाड़ा जाए तो उसकी शक्ति केवल एक दिन की होती है और यदि कुशा को पूर्णिमा के दिन उखाड़ा जाए तो उसका प्रभाव 15 दिन रहता है और सामान्य अमावस्या के दिन उखाड़ी गई कुशा का प्रभाव एक महीने तक रहता है।

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