भैरव जयन्ती पूजन और उसकी विधि

 भैरव जयन्ती पूजन और उसकी विधि

भगवान शिव के भी कई अवतार हुए हैं। उनका रूद्र अवतार तो श्री राम भक्त हनुमान को ही माना जाता है। इसी तरह इसी तरह भगवान शिव के ही एक अन्य अवतार माने जाते हैं भैरव जी। इन भैरव की उत्पति हुई थी मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को।


 

 

भैरव की कहानी -एक कथा के अनुसार एक बार सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने भगवान भोलेनाथ की वेशभूषा एवं उनके गणों को लेकर भगवान शिव के बारे में अशिष्ट टिप्पणी कर डाली इस पर शिव के क्रोध से विशालकाय दंडधारी प्रचंडकाय काया प्रकट हुई और ब्रह्मा जी का संहार करने दौड़ी। कुछ में तो यहां तक है कि इस काया ने ब्रह्मा के एक शीश को अपने नाखून से काट दिया। तत्पश्चात भगवान शिव के हस्तक्षेप से उसे शांत किया गया। तभी से ब्रह्मा जी के चार शीष शेष रह गये। जिस दिन यह विशाल काया प्रकट हुई वह मार्गशीर्ष मास की कृष्णाष्टमी का दिन था। भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न इस काया का नाम भैरव पड़ा। कालांतर में भैरव साधना बटुक भैरव और काल भैरव के रूप में होने लगी। वहीं तंत्रशास्त्र में असितांग-भैरव, रुद्र-भैरव, चंद्र-भैरव, क्रोध-भैरव, उन्मत्त-भैरव, कपाली-भैरव, भीषण-भैरव तथा संहार-भैरव आदि अष्ट-भैरव का उल्लेख मिलता है। ब्रह्मा जी का शीष काटने के कारण इन पर ब्रह्म हत्या का दोष भी लगा जिससे मुक्ति पाने के लिये कई वर्षों तक भटकने के पश्चात काशी में आकर इन्हें मुक्ति मिली।

एक अन्य कथा के अनुसार अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के लिये भगवान शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति मानी जाती है। अंधकासुर के वध के बाद भगवान शिव ने इन्हें अपनी पुरी काशी का कोतवाल नियुक्त किया।

 

 

पूजा का महत्व - भैरव को भय का हरण और जगत का भरण करने वाला बताया गया। भैरव शब्द के इन तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियां समाहित मानी जाती हैं। वेदों में जिस परम पुरुष की महिमा का गान रुद्र रूप में हुआ उसी स्वरूप का वर्णन तंत्र शास्त्र में भैरव नाम से किया गया है। जिनके भय से सूर्य एवं अग्नि भी ताप लेते हैं, इंद्र-वायु मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं वे परम शक्तिमान भैरव हैं। वामकेश्वर तंत्र की योगिनीह्रदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं, ‘विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः। अर्थात भरण, रमश, वमन यानि सृष्टि की उत्पति, पालन और उसका संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। अन्य तंत्र ग्रंथों में भी शंकर के भैरव रूप को सृष्टि का संचालक माना गया है।

चूंकि भैरव का जन्म मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी के दिन हुआ था इसलिये इस दिन मध्यरात्रि के समय भैरव की पूजा आराधना की जाती है रात्रि जागरण भी किया जाता है। दिन में भैरव उपासक उपवास भी रखते हैं। मान्यता है कि भैरव की साधना करने से हर तरह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। विशेषकर शनि, राहू, केतु मंगल जैसे मारकेश ग्रहों के कोप से जो जातक पीड़ित होते हैं उन्हें भैरव साधना अवश्य करनी चाहिये। भैरव के जप, पाठ और हवन अनुष्ठान से मृत्यु तुल्य कष्ट भी समाप्त हो जाते हैं।

 

व्रत पूजन विधि- अष्टमी के दिन प्रात:काल उठकर नित्य क्रिया से निवृत होकर स्नानादि कर स्वच्छ होना चाहिये। तत्पश्चात पितरों का तर्पण श्राद्ध करके कालभैरव की पूजा करनी चाहिये। इस दिन व्यक्ति को पूरे दिन व्रत रखना चाहिये मध्यरात्रि में धूप, दीप, गंध, काले तिल, उड़द, सरसों तेल आदि से पूजा कर भैरव आरती करनी चाहिये। उपवास के साथ-साथ रात्रि जागरण का भी बहुत अधिक महत्व होता है। काले कुत्ते को भैरव की सवारी माना जाता है इसलिये व्रत समाप्ति पर सबसे पहले कुत्ते को भोग लगाना चाहिये। मान्यता है कि इस दिन कुत्ते को भोजन करवाने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।

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