माता सिद्धिदात्री
माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस
दिन शास्त्रीय विधि-विधान
और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की
प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर
पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें
आ
जाती है।
नवदुर्गा और
दस महाविद्याओं में काली ही
प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की
शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियाँ
प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति
हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों
की अधिष्ठात्री देवी
लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी
कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
एक और कथा:- इस पर्व से जुड़ी एक अन्य
कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। और प्रत्याशित प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य,
इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा है। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।
पूजन विधि:-
शरद नवरात्रि की तरह कलश स्थापना से किया जाता है | कलश स्थापना के एक दिन पहले ही जौ और कलश को गंगाजल में डुबाकर रख दें | इससे जौ और कलश निर्मल हो जाएंगे | आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन स्नानादि से निवृत होकर कलश पर चंदन का लेप लगाकर स्थापना करें |
कलश स्थापना के साथ चैत्र नवरात्रि व्रत का संकल्प ले | संकल्प लेने के पश्चात् गणपति पूजन, पुन्यावाचन, नान्दी श्राद्ध, मातृकापूजन और ऋत्विक वरण की प्रतिज्ञा लें | तत्पश्चात धरती माँ का आशीर्वाद लेकर कलश के अंदर पंच रत्न, दूर्वा व पंच पल्लव पंच पल्लव : आम के पत्ते, बरगद, गूलर, पीपल, पाकर के पत्ते डालें |
एक हरे नारियल पर लाल वस्त्र लपेटकर कलश के ऊपर रखें | कलश के नीचे रखने के लिए गंगा बालू का प्रयोग करें | ऊं क्लीं दुर्गाय नम: कहकर उसमें जौ को बोएं | कलश के पास ही नवग्रह भी बना लें |
उपर्युक्त सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् जौ से भरा पात्र कलश के ऊपर रखकर वरुण देव की पूजा – अर्चना करें व माँ दुर्गा का आह्वान करें | आसन, आचमन, पास, अर्थ, पंचामृत, स्नान, वस्त्र, अलंकार, गंध, अक्षत, पुष्प व परिमल से अंग – पूजन करें | इस क्रिया से प्रतिपदा से नवमी तक माता के नौ रूपों की पूजा – अर्चना करें | राम नवमी के दिन 9 कन्याओं को श्रद्धा पूर्वक भोजन खिलाकर व दान देके विदा करे|
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