सफ़ला एकादसी पूजन और उसकी विधि
पद्मपुराणमें पौषमास के कृष्णपक्ष की एकादशी के विषय में युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बोले-बडे-बडे यज्ञों से भी मुझे उतना संतोष नहीं होता, जितना एकादशी व्रत के अनुष्ठान से होता है।

जो
भक्त इस प्रकार
सफला एकादशी का
व्रत रखते हैं
व रात्रि में
जागरण एवं भजन
कीर्तन करते हैं
उन्हें श्रेष्ठ यज्ञों से जो पुण्य
मिलता उससे कहीं
बढ़कर फल की प्राप्ति होती है।
कथा - प्राचीन समय में
चंपावती नगरी में
महीष्मती नाम का
राजा राज्य करता
था| राजा का बड़ा
बेटा लुम्पक बहुत
ही दुराचारी था| मांस, मदिरा
के साथ परस्त्रीगामी था| एक दिन पिता
ने उसे घर
से निकाल दिया
और वह जंगल
में एक पतित
पावन वृक्ष के
नीचे रहने लगा
और यह वृक्ष
देवताओं को बहुत
प्रिय था, यह वृक्ष
उनका क्रीड़ा स्थल
था| जंगल में रहते
भी लुम्पक में
कोई सुधार नहीं
आया और वह
टेढ़ा का टेढ़ा
ही रहा|
अपने
जीवनयापन के लिए
वह पिता के
राज्य में जाकर
चोरी कर आता, सिपाही
उसे पकड़ते फिर
छोड़ देते| एक बार पौष माह की
दशमी को वह
फिर चोरी करने
गया| लूटमार
एवं अत्याचार करने
के लिए सिपाहियों ने उसे फिर
पकड़ा और इस
बार उसके वस्त्र
उतारकर उसे वन
भेज दिया| लुम्पक उसी पीपल
के वृक्ष के
नीचे जा बैठा
जहाँ उसने शरण
ले रखी थी| यहाँ
हेमगिरि पर्वत की
पवन बहते आई
और पापी लुम्पक
के शरीर में
प्रवेश कर गई
जिससे उसे गठिया
हो गया| गठिया के
कारण उसके सारे
शरीर में दर्द
होने लगा| अब ऎसी
स्थिति में नहीं
था कि चोरी
करने जा सके|
सुबह
सूर्य की किरणें
लगने से दर्द
कुछ कम हुआ
लेकिन पेट की
अग्नि शांत करने
के लिए वह
जीवों को मारने
में असहाय था
तो उसने वहीं
पीपल के नीचे
गिरे फलों को
उठाया और पीपल
की जड़ में
रखकर कहने लगा
कि हे प्रभो! इन वन फलों
का आप भी
भोग लगाइए, मैं अब
भूखा रहकर अपने
प्राण त्याग दूंगा
क्योंकि ऎसे कष्ट
भरे जीवन से
तो मौत अच्छी
है| ऎसा विचार कर
वह प्रभु के
ध्यान में मग्न
हो गया| वह सारा
दिन प्रार्थना करता
रहा प्रन्तु प्रभु
ने उन फलों
का भोग नहीं
लगाया|
सुबह
हुई तो आकाश
से एक दिव्य
घोड़ा उतरकर उसके
सामने प्रकट हो
गया और आकाशवाणी द्वारा नारायण भगवान
बोले कि तुमने
अनजाने में सफला
एकादशी का व्रत
किया है जिसके
प्रभाव से तुम्हारे सारे पाप नष्ट
हो गए हैं| जैसे
अग्नि को जाने-अनजाने में हाथ
लगाने से हाथ
जल जाता है
वैसे ही अनजाने
में ही सही, सफलता
एकादशी का व्रत
करने से वह
उसका फल अवश्य
दिखाती है| नारायण बोले
कि अब तुम
इस घोड़े पर
सवार होकर अपने
पिता के पास
जाओ वह तुम्हें राज्य दे देगें| सफला
एकादशी सर्व सफल
करने वाली है|
प्रभु
की आज्ञा से
लुम्पक अपने पिता
के पास जाता
है और पिता
लुम्पक को राजगद्दी प्रदान कर स्वयं वन की ओर
तप करने चले
जाते हैं| अब लुम्पक के
राज्य में सारी
प्रजा एकादशी का
व्रत विधि विधान
से करने लगी| जो
व्यक्ति इस सफला
एकादशी का व्रत
करता है, कथा सुनता
है अथवा कथा
कहता है उसे
अश्वमेघ यज्ञ करने
जैसा फल मिलता
है|
सफला एकादशी का व्रत अपने नामानुसार मनोनुकूल फल प्रदान करने वाला है। भगवान श्री कृष्ण इस व्रत की बड़ी महिमा बताते हैं। इस एकादशी के व्रत से व्यक्तित को जीवन में उत्तम फल की प्राप्ति होती है और वह जीवन का सुख भोगकर मृत्यु पश्चात विष्णु लोक को प्राप्त होता है|
पूजन
विधि - एकादशी-व्रत अवश्य करना चाहिए। पौषमास के कृष्णपक्ष में सफला नाम की एकादशी होती है। इस दिन भगवान नारायण की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। यह एकादशी कल्याण करने वाली है। एकादशी समस्त व्रतों में श्रेष्ठ है। सफलाएकादशी के दिन
श्रीहरिके विभिन्न नाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए फलों
के द्वारा उनका
पूजन करें। धूप-दीप से देवदेवेश्वरश्रीहरिकी अर्चना
करें। सफला एकादशी
के दिन दीप-दान जरूर करें।
रात को वैष्णवों के साथ नाम-संकीर्तन करते हुए
जगना चाहिए। एकादशी
का रात्रि में
जागरण करने से
जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों
वर्ष तक तपस्या
करने पर भी
नहीं मिलता।
व्रत
विधान के विषय
में जैसा कि
श्री कृष्ण कहते
हैं दशमी की
तिथि को शुद्ध
और सात्विक आहार
एक समय लेना चाहिए| इस दिन आचरण भी
सात्विक होना चाहिए| व्रत करने
वाले को भोग
विलास एवं काम
की भावना को
त्याग कर नारायण
की छवि मन
में बसाने हेतु
प्रयत्न करना चाहिए| एकादशी तिथि
के दिन प्रात: स्नान कर शुद्ध
वस्त्र धारण कर
माथे पर श्रीखंड चंदन अथवा गोपी
चंदन लगाकर कमल
अथवा वैजयन्ती फूल, फल, गंगा
जल, पंचामृत, धूप, दीप, सहित लक्ष्मी नारायण
की पूजा एवं
आरती करें| संध्या काल में
अगर चाहें तो
दीप दान के
पश्चात फलाहार कर
सकते हैं। द्वादशी के दिन भगवान
की पूजा के
पश्चात कर्मकाण्डी ब्राह्मण को भोजन करवा
कर जनेऊ एवं
दक्षिणा देकर विदा
करने के पश्चात
भोजन करें|
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